चाबहार बंदरगाह: भारत की रणनीतिक विदेश नीति का अहम केंद्र
ईरान में स्थित चाबहार बंदरगाह भारत की विदेश और व्यापार नीति का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। यह बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुँच देता है। इसी वजह से चाबहार बंदरगाह को भारत की रणनीतिक परियोजनाओं में गिना जाता है।
भारत ने वर्ष 2017 से चाबहार बंदरगाह में निवेश शुरू किया था। इस परियोजना का उद्देश्य क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाना और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नया रास्ता देना था। यह बंदरगाह होर्मुज जलसंधि से बाहर स्थित है, जिससे बड़े जहाज़ों की आवाजाही सुरक्षित रहती है। यही कारण है कि इसे ग्वादर पोर्ट के विकल्प के रूप में भी देखा जाता है।
हालांकि हालिया बजट में चाबहार बंदरगाह के लिए कोई फंड आवंटन नहीं होने से कई सवाल उठे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध, वैश्विक भू-राजनीतिक बदलाव और क्षेत्रीय अस्थिरता इसका मुख्य कारण हो सकते हैं। इसके बावजूद भारत ने मई 2024 में शाहिद बहिश्ती टर्मिनल के संचालन को लेकर 10 साल का समझौता किया है, जो इस परियोजना की निरंतरता को दर्शाता है।
भारत के लिए चाबहार बंदरगाह केवल व्यापारिक नहीं बल्कि मानवीय सहायता और रणनीतिक संतुलन का भी साधन रहा है। अफ़ग़ानिस्तान को भेजी गई खाद्यान्न आपूर्ति इसका बड़ा उदाहरण है।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
प्रश्न: चाबहार बंदरगाह भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: यह भारत को मध्य एशिया और अफ़ग़ानिस्तान तक सीधी पहुँच देता है।
प्रश्न: क्या भारत ने चाबहार से दूरी बना ली है?
उत्तर: नहीं, संचालन समझौता अभी भी जारी है।
प्रश्न: चाबहार ग्वादर पोर्ट से कैसे अलग है?
उत्तर: चाबहार भारत के हितों से जुड़ा है, जबकि ग्वादर चीन-पाकिस्तान परियोजना का हिस्सा है।
